
रात अपने सबसे गहरे साए में डूबी हुई थी। शहर की ऊँची इमारतों के पीछे चाँद आधा छिपा हुआ था, जैसे किसी राज़ को अपने सीने में दबाए बैठा हो। रायान की हवेली के कमरे में हल्की पीली रोशनी जल रही थी, और उस रोशनी में खड़ी ज़ारा की साँसें बेचैन लहरों की तरह उठ-गिर रही थीं।
रायान खिड़की के पास खड़ा था, उसकी पीठ ज़ारा की ओर थी, लेकिन उसका पूरा वजूद उसी की मौजूदगी से तप रहा था। हवा में इत्र और बारिश की मिली-जुली खुशबू थी, और उनके बीच एक अनकहा तूफ़ान।










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