
सुबह की क्लास हमेशा की तरह शुरू हुई थी, लेकिन अनाया के लिए आज हर मिनट बोझ बन रहा था। वह पिछली बेंच में बैठी थी, नज़रें किताब पर टिकीं, दिल कहीं और। उसने तय कर लिया था—आरोह से दूरी। पूरी दूरी। उनकी हर नज़र, हर फुसफुसाहट, हर वह गर्म याद जो रातों को नींद छीन लेती थी—सब से मुँह मोड़ लेना ही बेहतर था।
आरोह ने जैसे ही क्लास में कदम रखा, उनकी निगाहें अनाया को ढूँढने लगीं। वह दिखी—पर बदली हुई। नज़रें उठती नहीं, चेहरा शांत, जैसे वह उन्हें पहचानती ही न हो। यह अनदेखा करना आरोह को चुभ गया। उनकी आवाज़ में पढ़ाने का ठहराव था, पर भीतर ईर्ष्या उबाल मार रही थी। हर सवाल, हर उदाहरण—सब में उनकी आँखें उसी ओर लौट आतीं।










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