
कॉरिडोर की खिड़कियों से धूप छनकर फर्श पर फैल रही थी, लेकिन अनाया के भीतर अँधेरा गहराता जा रहा था। वह फाइलें लेकर तेज़ क़दमों से चल रही थी कि अचानक उसकी नज़र सामने टिक गई—आरोह, डॉक्टर निहारा सेन के साथ, बहुत क़रीब। इतना क़रीब कि उनकी हँसी एक-दूसरे की साँसों में घुल रही थी। निहारा का हाथ हल्के से उनकी बाँह पर था, और आरोह झुककर कुछ कह रहे थे—वो वही झुकाव, वही नरमी, वही गहरी मुस्कान… जो कभी अनाया के लिए थी।
उस पल अनाया का दिल जैसे किसी ने कसकर मरोड़ दिया। पिछले दिनों की सारी नज़दीकियाँ, वो गरम फुसफुसाहटें, वो रुक-रुककर बहती साँसें—सब एक साथ आँखों के सामने तैर गईं। और उसी के साथ, नफ़रत की एक नई परत चढ़ती चली गई।










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